कुछ तनहा यादें

कुछ तनहा यादें

आज फिर वो समां बस यूँ ही याद आ गया 
सिमट कर तेरा मेरी बाँहों में 
आँखों को बंद कर सुकून की लम्बी  सांसों से 
मेरे दिल की धड़कन को सुनना 
यक़ीनन कुछ शब्द नहीं कुछ भाव नहीं 
मैं समझा तेरी शिकायत को 
मिला था सालों बाद कहीं 
कुछ अधूरी बातें लिए होठों पर 
कुछ भूल गयी मुझे पाकर 
कुछ अचानक ही याद आ गया जो भूली थी कहेंगे मिलकर 
वो शब्द अभी भी कैद रखें हैं 
मेरे जहन मेरे कानों ने 
क्यों भूल गयी तुम खुद कहकर मैं रोज मिलूंगी युहीं  आकर
बैठा हूँ सदियों से उसी जगह 
तेरे इंतजार की  घड़ियों में 
आओगी या भूल गयी कही कोई  और सनम पाकर  . 

                                                        -विवेक श्रीवास्तव ☺

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