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हूँ मैं जननी सी पर बेक़दर हो गयी हूँ 
दिया है कई प्रतिभाओं को जन्म मैंने भी 
पर समय की मात से कमजोर हो गयी हूँ 
लिखें हैं बहुमुखी बिधा बड़े बड़े राज हमने भी 
समां कुछ ऐसा है की खुद बेख़बर हो गयी हूँ। 
खुद जन्मी हूँ ब्रम्हवाणी से त्रिकाल के डमरु से 
पर आज अस्तित्व हीन हो गयी हूँ 
लड़ी हूँ खुद की बहनों से वज़ूद को लेकर 
आगे तो नहीं आयी मगर चुप बैठकर ग़मगीन हो गयी हूँ 
हाँ आती जरूर हूँ १४ सितंबर को 
तो क्या यही अधिकार है जिसके लिए लड़ी हूँ 
बस माध्यम समझो मुझे बोलचाल का महज 
तो क्या मैं वज़ूदहीन हो गयी हूँ ?
                                 -विवेक श्रीवास्तव ☺

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