जिन्दगी की रफ़्तार में जरा तेजी आ गयी

जिम्मेदारियों का बढ़ता बोझ
जिन्दगी की रफ़्तार में जरा तेजी आ गयी 
रुकना चाहूँ लाख मगर जिम्मेदारी आ गयी 
कभी अमीर तो कभी गरीब हुआ हूँ 
समझ नहीं आता कौन हूँ बीच में औक़ात आ गयी।
जिन्दगी की रफ़्तार में जरा तेजी आ गयी 
ये गाड़ी ये दौलत ये सोहरत सब मेरा तो है 
पर क्या करूँ मौत की सौगात आ गयी 
चाहा था कभी धूप तो कभी छाँव से रूबरू हो जाऊँ 
लेकिन कमबख़्त ये मौसम की बौछार आ गयी।
जिन्दगी की रफ़्तार में जरा तेजी आ गयी 
खूब उड़ा खुले आसमान में जुगुनू की तरह 
छू लिया था ऊँचाइयों का मुकाम हमने 
बस रुक गया जब सुबह की होश आ गयी 
जिन्दगी की रफ़्तार में जरा तेजी आ गयी। 
                                                   -विवेक श्रीवास्तव ☺

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