कल रात वो सपनो में आये थे
चेहरे पर बेरुखी सी थी लगता है कुछ मुरझाये थे
झिलमिलाना उनका होना मेरी तक़दीर की तरह
लगता है वो जरा जल्दी में आये थे
कल रात वो सपनो में आये थे। . .
सोचा था जरा दो चार हो जाये उन पुराने लम्हों साथ
खेल ले उनकी जुल्फों के अँधेरी रात में
सर रख कर उनकी गोद में एक बार फिर
पर सुकून को वो कहीं और छोड़ आये थे
कल रात वो सपनो में आये थे। ...
बड़े वक्त से इंतजार था इस लम्हे का मुझे
कि बैठूँ तेरे संग में तेरा होके मैं
सिलसिला बयाँ करू तेरे जाने के बाद का
कि हर दास्ताँ में बस तुम्ही समाये थे
कल रात वो सपनो में आये थे। ...
इतना कहना मेरा कि उठ कर जाने लगे वो
छुड़ा कर दामन मेरे हांथों से
लगता है दिल का सौदा कहीं और कर आये थे
कल रात वो सपनो में आये थे। ...
-विवेक श्रीवास्तव ☺

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