हे आशीष तुम दो आशीष मैं राजकुमार सा हो जाऊँ
उठूँ प्रभा की प्रभाकर से विश्व प्रेम को मैं पाऊँ
लिखूँ कृत्य अनुभव गामी हो
अमर कलम को कर जाऊँ
हे आशीष तुम दो आशीष मैं राजकुमार सा हो जाऊँ
बनूँ वो दीपक तेज सहित हो चमक उठे सारा संसार
धन्य हो जाये कलम मेरी यह
दर्शा पाऊँ यदि तुम्हारा प्यार
हे आशीष तुम दो आशीष मैं राजकुमार सा हो जाऊँ
तुम लोगों की पंकज छवि की अमित छाप जो मन में है
वही आनन्द यदि सुनूँ जो बंशी कृष्ण कान्हा की मुरली में है
हे आशीष तुम दो आशीष मैं राजकुमार सा हो जाऊँ
करूँ बात यदि अहसानों की कलम मेरी क्यों रूकती है
शायद इसको खबर हुई है जो चुपके से मुझसे कहती है
फँसा हूं जीवन के किसी राह में
तुम लोगों ने ही निकला है
सही बात तो यही है यारों तुम लोगों ने ही सभाला है
सकुचाती कलम मेरी भी कमी कोई न रह जाये
तुम्हारे अहसानो के आगे कोई बात बड़ी न लिख जाये
हे आशीष तुम दो आशीष मैं राजकुमार सा हो जाऊँ।
- विवेक श्रीवास्तव ☺

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