अब न तेरे सपने आते हैं और न ही तेरी यादों की हिचकियाँ
अब मेरे जुबाँ पर हैं तेरे लिए बस दो-चार गालियाँ
जो कभी तेरे भी जुबाँ पर हुआ करती थी मुझे छोड़ने के लिए
तो तू भी सुन ले इज्जत मेरी भी है
बहुत मौका दिया तुझको मेरे सीने से लगाने का
पर क्या कभी एहसास भी था तुझे मुझसे दूर जाने का
जा जी ले खुद की जिन्दगी ये काफ़िर तू ग़द्दार भी है
ले चला गया तेरी जिन्दगी से ये विचार भी तेरे हैं।
-विवेक श्रीवास्तव ☺

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