तुम परी थी


सावन का मौसम आते ही मुझे क्यों बेचैन करता है 
कही तुम मिलने तो नहीं आ रहे इन फिजाओं में 
बचाते हुए इस मौसम की शरारत से खुद की नजाकत को 
कही तुम भीग न जाओ 
तुम्हारी भीगी जुल्फें बारिश को और न तेज कर दें 
तेरे फिराक बैठा है ये पागल पयोधर 
चला आया है पता नहीं कहाँ कहाँ ढूँढ कर तुम्हे 
ठहरा है दर पर तेरे क़यामत की जिद लिए 
तेरा मेरे साथ होना खलता क्यों है इस नटखट को 
कही तुम हूर तो नहीं आयी हो जन्नत से 
कर के बेचैन मेरे मन को तुमने 
रची हो साजिस मुझे बर्बाद करने की 
अब समझा क्यों छोड़ गए यूँ तनहा इस हालात पर 
मैं इंसान हूँ तुम परी थी तुम परी थी तुम परी थी। 
                                                              -विवेक श्रीवास्तव ☺

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