बेवजह बैठा उन गलियों में फिर से जहाँ तुम मुझसे मिला करते थे
कभी प्यार तो कभी सिकवा गिला करते थे
हाँ ,ले आया था सारी चीजें जिन्हे तुम पसंद करते थे
जिन्हे तुम मेरे हांथो से छीना करते थे
उस तकरार की यादें रुला दे रहीं
आ जाओ न क्यों भुला दे रही
मासूम हूँ ना समझ हूँ प्यार करना नहीं आता
इस जहन से तेरे यादों का शाया नहीं जाता
अब शिकायत भी करूँ तो किससे ,लड़ूँ भी तो किससे
बेक़रार सा ख़ालिश सा बेवजह हो रहा
आ जाओ न देखो क्या समां हो रहा
ये हरियाली ये मौसम ये बारिश की फुहार
लगा रही तन मन में एक अजीब सी अंगार
क्या पता इस बेवकूफ से फिर से प्यार हो जाये
तेरे लौटने से मेरे आंगन में फिर बहार आ जाये
न करूँ वो गलतियाँ भूल कर भी जिन्हे तुम नापसंद करते हो
सच मान लूँ जिसे तुम हाँ करते हो
एक मौका प्यार में न दिया गया तुमसे
एक छोटा सा फैसला न लिया गया तुमसे
क्या इतना कमजोर था मेरा प्यार
जिन कसमों को लेकर तुम बैठे हो वो सब टूट जायेंगे
यकीन मानो जिस दिन मेरे सीने से ये प्राण जायेंगे
तब सायद एहसास होगा तुम्हे मेरे इस झूठे प्यार का
हाल जानोगे तब दिले बेक़रार का
रो लेना हमदर्दी में ही सही मुझे यकीन हो जायेगा
तुम्हारे सच्चे प्यार का पुख्ता प्रमाण मिल जायेगा।
-विवेक श्रीवास्तव ☺

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