हमने देखे हैं हालत बिगड़ते अच्छे अच्छों की
हमने देखे हैं झूठ की सफाई सच्चे सच्चों की
आँखों में मासूमियत लेकर मुखर जाये जुबान से
हमने नापी है गहराई गड्डे गड्डों की
गिरगिट हो बदल दे फितरत गम नहीं होता
हमने देखे है सूरत बदलते अच्छे अच्छों की
रंगीनियां रास नहीं आती गर मौसम रुखा हो
हमने सूंघे हैं खुसबू फूलों फूलों की
छोड़ दे रास्ता ये काफिर मंजिल हुई नहीं किसी की
रास्ता झूठ का हो तो फिसल जाते हैं अच्छे अच्छे।
-विवेक श्रीवास्तव ☺

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